अमेरिका-ईरान विवाद: 16 अप्रैल की बैठक का खौफनाक सच, क्या टल जाएगा महाविनाश?

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अमेरिका-ईरान विवाद (America-Iran Dispute) को सुलझाने के लिए एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आई है। 16 अप्रैल को होने वाली इस बैठक पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं।

अमेरिका-ईरान विवाद 16 अप्रैल बैठक

अमेरिका-ईरान विवाद: 16 अप्रैल को फिर आमने-सामने होंगे दो कट्टर दुश्मन

अमेरिका-ईरान विवाद को लेकर एक बड़ी खबर आई है कि 16 अप्रैल को दूसरी बैठक होने वाली है। मध्य पूर्व (Middle East) में बढ़ती तल्खी के बीच कूटनीतिक गलियारों में एक बार फिर सुगबुगाहट तेज हो गई है। इस्लामाबाद में हुई पहले चरण की चर्चा बेनतीजा रहने के बाद, अब 16 अप्रैल को अमेरिका और ईरान के बीच दोबारा वार्ता होने की संभावना है। 21 अप्रैल को समाप्त हो रहे अमेरिका-ईरान विवाद के अस्थिर ‘युद्धविराम’ से ठीक पहले होने वाली यह बैठक वैश्विक शांति की अंतिम उम्मीद मानी जा रही है।

इस्लामाबाद या जिनेवा? बैठक की मेजबानी को लेकर छिड़ी जंग

अमेरिका-ईरान विवाद की अगली मुलाकात के स्थान को लेकर अभी भी संशय की स्थिति बनी हुई है। पाकिस्तान एक बार फिर इस हाई-प्रोफाइल बैठक की मेजबानी करने की पूरी कोशिश कर रहा है, क्योंकि पहले दौर की मैराथन 21 घंटे की चर्चा इस्लामाबाद में ही संपन्न हुई थी। हालांकि, सूत्रों का कहना है कि पूर्ण निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए स्विट्जरलैंड के जिनेवा को एक सशक्त विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। जानकारों का मानना है कि वेन्यू का अंतिम फैसला ही यह स्पष्ट करेगा कि दोनों पक्ष अमेरिका-ईरान विवाद समझौते को लेकर कितने गंभीर हैं।

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अमेरिका-ईरान विवाद संवाद की राह की चुनौतियां और शर्तें

दोनों देशों के बीच वार्ता के सफल होने में मुख्य बाधा परमाणु कार्यक्रम और उन पर लगी पाबंदियां हैं। अमेरिका ने प्रस्ताव दिया है कि ईरान पर यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) को लेकर दो दशकों का सख्त प्रतिबंध लागू किया जाए। इसके विपरीत, तेहरान इस पाबंदी को केवल 5 साल तक सीमित रखने के पक्ष में है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बातचीत की इच्छा तो जताई है, लेकिन उनकी शर्त है कि तेहरान को अमेरिका की सभी मांगों को पूरी तरह मानना होगा। दबाव बनाने के लिए ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ की घेराबंदी कर दी है।

आर्थिक क्षति और रणनीतिक रुख

युद्ध जैसी परिस्थितियों और सैन्य तनाव के कारण ईरान को अब तक करीब 270 अरब डॉलर के भारी नुकसान का अनुमान है। भारत में ईरान के राजदूत, मोहम्मद फथली ने नई दिल्ली में स्पष्ट किया कि उनका देश समझौते का पक्षधर है, लेकिन यदि कूटनीतिक प्रयास विफल रहते हैं, तो वे जवाबी सैन्य कार्रवाई सहित किसी भी विकल्प को चुनने में पीछे नहीं हटेंगे।

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वैश्विक बाजारों में सुधार के संकेत

अमेरिका-ईरान विवाद की शांति बहाली की खबरों के बीच दुनिया भर के शेयर बाजारों में रौनक लौट आई है। जापान का प्रमुख इंडेक्स Nikkei 225 ढाई प्रतिशत की बढ़त के साथ बंद हुआ, वहीं दक्षिण कोरिया के KOSPI में लगभग 3.7% का बड़ा उछाल देखा गया। भारतीय और हांगकांग के बाजारों ने भी मजबूती दिखाई। युद्ध का खतरा कम होने की उम्मीद में ब्रेंट क्रूड के दाम 1.5% गिरकर $98 प्रति बैरल से नीचे आ गए, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए सुकून देने वाली खबर है।

ट्रंप की नीतियों पर अंतरराष्ट्रीय दबाव

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने पोप पर हुए हमले के मामले में डोनाल्ड ट्रंप की निंदा की है, जो वैश्विक राजनीति के बदलते समीकरणों को उजागर करता है। दूसरी ओर, सऊदी अरब भी अमेरिका को अपनी रणनीति बदलने के लिए कह रहा है। सऊदी का मानना है कि होर्मुज की घेराबंदी से खतरा खत्म नहीं होगा, बल्कि ईरान की आक्रामकता अब ‘लाल सागर’ (Red Sea) की तरफ बढ़ सकती है।

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